क्या चेक बाउंस का केस मियाद समाप्त होने के बाद भी दाखिल हो सकता है

Negotiable Instruments Act के अंतर्गत, वैधानिक अवधि समाप्त होने के बाद भी चेक बाउंस का मामला दायर किया जा सकता है। यदि शिकायतकर्ता देरी का उचित कारण प्रस्तुत करता है, तो न्यायालय विलंब को क्षमा कर शिकायत स्वीकार कर सकता है। नोटिस के बाद निर्धारित समय में भुगतान न होने पर कार्यवाही प्रारंभ की जा सकती है।

क्या चेक बाउंस का केस मियाद समाप्त होने के बाद भी दाखिल हो सकता है? मैंने कुछ रूपया एक मित्र को उधार दिया था, जिसके बदले में उसने मुझे एक चेक दिया था कि समय पर यदि धन वापस नहीं कर पाया तो चेक बैंक में जमा कर देना। जिसके आधार पर उक्त धन मैंने दे दिया था। सात महीने बीतने के बाद भी उसने धन वापस नही किया तब मैंने एक विधिक नोटिस दिया जिसका कोई जवाब नहीं दिया गया। काफी समय बीत जाने के बाद भी मेरा मित्र धन वापस नहीं कर पा रहा था, उसके परेशानी को देखते हुए मैंने वह चेक वापस कर दिया तथा उसके बदले में छ: महीने का पोस्ट डेटेड चेक ले लिया कि कम से कम अगले छ: माह में तो वह धन वापस कर ही देगा। लेकिन समय बीत जाने के बाद भी उसने फूटी कौड़ी भी वापस नहीं किया। जिसके बाद मैंने वह चेक अपने खाते में भुनाने के लिए लगा दिया। वह चेक बाउंस हो गया जिसके बाद लीगल नोटिस दिया गया लेकिन उसने पैसा नही दिया। नोटिस समय सीमा समाप्त होने के बाद मैने परिवाद दाखिल किया लेकिन वह बारह दिनों के बाद दाखिल किया गया था। अब क्या मैं परिवाद दाखिल नहीं कर पाउँगा?

उत्तर प्रदेश

हाँ, परिवाद दाखिल करने के समय सीमा या मियाद समाप्त होने के बाद भी चेक बाउंस के अपराध में परिवाद दाखिल किया जा सकता है। परक्राम्य अधिनियम में चेक के अनादरण होने के बाद किस प्रकार परिवाद दाखिल किया जाएगा इसकी पूरी प्रक्रिया नियत है। धारा 142 में बताया गया है कि चेक बाउंस के मामले में न्यायालय द्वारा कब परिवाद पर अपराध का संज्ञान लिया जायेगा।

जब बैंक से चेक के अनादरण की सूचना प्राप्त होने के तीस दिनों के भीतर धन के मांग की सूचना चेक के लेखक (चेक जारी करने वाला) को दे दिया गया है, और इसकी सूचना प्राप्त होने के पंद्रह दिनों के भीतर उसने धन का भुगतान नहीं किया है तो ठीक पंद्रह दिन बीतने के बाद अपराध कारित हो जाता है तथा न्यायालय द्वारा परिवाद पर उसका संज्ञान लिया जाएगा।

धारा 142 परक्राम्य अधिनियम के अनुसार जिस दिन अपराध कारित किया गया है उस दिन से ठीक एक महीने के भीतर परिवाद दाखिल कर देना चाहिए। यदि परिवादी एक माह के भीतर परिवाद दाखिल करने में किसी सक्षम कारण से विरत रहा है तो न्यायालय एक माह का समय बीत जाने के बाद भी परिवाद स्वीकार कर सकता है। अर्थात जब परिवादी न्यायालय को संतुष्ट कर देता है कि वह किसी विधि-सम्मत कारण से एक माह के भीतर परिवाद दाखिल करने में असमर्थ रहा था तो मियाद बीत जाने के बाद भी न्यायालय परिवाद स्वीकार कर सकता है तथा अपराध का संज्ञान ले सकता है। यदि परिवादी द्वारा देरी का कोई विधिसम्मत आधार नहीं बताया जाता तो मियाद के बाद परिवाद स्वीकार नहीं किया जायेगा।

यदि आप न्यायालय को संतुष्ट कर पाते है कि किन कारणों से आप अपराध कारित होने के दिन से एक माह के भीतर परिवाद दाखिल नहीं कर पाए थे तो न्यायालय द्वारा परिवाद स्वीकार कर लिया जायेगा। लेकिन इसके लिए परिवाद के साथ एक पृथक प्रार्थना पत्र (application for condonation of delay) भी दिया जाएगा, जिसमें न्यायालय से अनुमति माँगा जाएगा कि वह विलम्ब को माफ करते हुए परिवाद दाखिल करने की अनुमति दे। जब न्यायालय द्वारा विलम्ब को माफ कर दिया जाता है तो परिवाद स्वीकार कर लिया जायेगा।

विलम्ब के समर्थन में यदि कोई दस्तावेजी साक्ष्य उपलब्ध है तो उसे न्यायालय के समक्ष विलम्ब माफी प्रार्थना पत्र के साथ बतौर साक्ष्य देना उचित रहेगा। न्यायालय द्वारा आसानी से विलम्बित परिवाद को स्वीकार किया जा सकता है। परिवाद दाखिल करने के मियाद समाप्त होने के बाद धारा 5 परिवाद अधिनियम के तहत प्रार्थना पत्र देने की आवश्यकता नहीं है, धारा 142 स्वतः न्यायालय को सक्षम बनाता है कि देरी का उचित कारण होने पर परिवाद स्वीकार किया जाये। उपरोक्त परिस्थितियों में आप मियाद समाप्त होने के बाद भी परिवाद दाखिल कर सकते हैं।

संबन्धित: कब न्यायालय द्वारा परिवाद को प्रीमैच्योर होने पर खारिज किया जायेगा

परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 142 के तहत चेक बाउंस का मामला मियाद समाप्त होने के बाद भी दाखिल किया जा सकता है। सामान्यतः अपराध कारित होने के एक महीने के भीतर परिवाद देना अनिवार्य है। हालांकि, यदि परिवादी देरी का उचित और कानूनी कारण स्पष्ट कर सके, तो न्यायालय इसे स्वीकार कर सकता है।

विलंब होने पर परिवाद के साथ देरी माफी का आवेदन देना आवश्यक होता है। यदि न्यायालय आवेदक द्वारा बताए गए कारणों से संतुष्ट हो जाता है, तो वह समय सीमा बीतने के बावजूद मामले का संज्ञान ले सकता है। इसके लिए संबंधित साक्ष्य प्रस्तुत करना देरी माफी की प्रक्रिया को सुगम बनाता है।

Shivendra Pratap Singh

Shivendra Pratap Singh

Advocate

Advocate Shivendra, practicing law since 2005, specializes in criminal and matrimonial cases, extensive litigatin experience before the High Court, Sessions court & Family Court. He established kanoonirai.com in 2014 to provide dependable and pragmatic legal support. Over the years, he has successfully assisted thousands of clients, making the platform a trusted resource for criminal and matrimonial dispute resolution in India.

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