Breach of contract

एक आदमी ने एक कंपनी ज्वाइन की जिसके अपॉइंटमेंट लेटर में एक क्लोज था :- “You are expected to promote and expand the business of the company. you will not directly or indirectly, either solely or jointly, engage in any service or other business or profession whether during or, after the hours of employment without written sanction from the company” नौकरी के दौरान उस आदमी ने एक सर्विस प्रदान करने बाली कंपनी अपनी पत्नी और ससुर को निदेसक बनाते हुए बनाई! उसके बाद उस कंपनी का कॉन्ट्रैक्ट उस कंपनी में करा दिया जहाँ पर वो खुद कार्य करता था !…

एक आदमी ने एक कंपनी ज्वाइन की जिसके अपॉइंटमेंट लेटर में एक क्लोज था :-

“You are expected to promote and expand the business of the company. you will not directly or indirectly, either solely or jointly, engage in any service or other business or profession whether during or, after the hours of employment without written sanction from the company”

नौकरी के दौरान उस आदमी ने एक सर्विस प्रदान करने बाली कंपनी अपनी पत्नी और ससुर को निदेसक बनाते हुए बनाई! उसके बाद उस कंपनी का कॉन्ट्रैक्ट उस कंपनी में करा दिया जहाँ पर वो खुद कार्य करता था ! उसने आपने सीनियर को इस संबध में जानकारी नहीं दी ! परन्तु सभी नियम और कायदे कानून का पूरी तरह से पालन किया तथा किसी प्रकार का घपला नहीं किया नियमानुसार जिस प्रकार बाकि सर्विस प्रदान करने बाली कम्पनियो को काम दिया जाता था उसी प्रकार वो अपनी कंपनी को भी कुछ काम देने लगा और इसमें उसने कोई भी पकछपात अपनी कंपनी के साथ नहीं किया तथा उस कंपनी ने भी दिए गए काम को पूरी निष्ठा के साथ पूरी ईमानदारी के साथ बिना किसी शिकायत के पूरा किया जिसको अलग अलग विभागों नें प्रतिएक बार चेक किया तथा सही पाया! जिसमें उस आदमी का कोई भी interfere नहीं था ! अब सवाल ये हैं की – 

१. उस आदमी को क्या सजा हो सकती है.

२. क्या वो आदमी धारा ४२० का दोषी होगा.

३. क्या उसकी कंपनी के डायरेक्टर्स को भी दोषी माना जायेगा

४. जो contract ब्रेक हुआ उसके लिए किया दण्ड हो सकता है !

५. क्या अग्रिम जमानत की आव्यसक्ता होगी.

६. यदि हो तो कोई रेफरेंस केस भी बताएं

कार्य की संविदा के अनुसार आपको कारबार के विस्तार और प्रसार के लिए कार्य करना था और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी भी सेवा और कारबार में बिना लिखित पूर्व अनुमति के नहीं लगना था। इसके अनुसार आपको किसी अन्य सेवा में लगने से रोका गया था। संविदा के अनुसार आपको उक्त निर्देश दिया गया था जिसका पालन आपके द्वारा करना था।

आपके और आपके नियोक्ता के बीच अभिकरण का सम्बन्ध था। संविदा विधि में कुछ सिद्धांत बताया गया है जिसके अनुसार यदि अभिकरण में स्वामी और अभिकर्ता के बीच सम्बन्धो को विस्तार से विरचित नहीं किया गया है तो वहां पर संविदा विधि का नियम लागु होगा।

धारा २११ के अनुसार अभिकर्ता को अपने स्वामी के निर्देशों का पालन करना चाहिए यदि निर्देश नहीं दिया गया है तो व्यापर के प्रथाओं के अनुसार कार्य करना चाहिए। धार २१५ के अनुसार अभिकर्ता को अपने स्वं के लेखे से व्यापर नहीं करना चाहिए यदि अभिकर्ता ऐसा करता है तो उसे अपने मालिक का सम्मति से ऐसा करना चाहिए। यदि अभिकर्ता ऐसा करता है तो धारा २१६ के अनुसार मालिक को अधिकार है की वो उस फायदे को अभिकर्ता से वापस ले ले।

आपके मामले के तथ्यों के अनुसार आपने अपने पत्नी और स्वसुर के नाम पर एक कंपनी बनाया था। आप उसमे किसी भी प्रकार से शामिल नहीं थे। लेकिन आपका छिपा हुआ हित था। यद्यपि आपने कंपनी के साथ अपने लेखे कोई व्यापार नहीं किया। कंपनी का पृथक विधिक अस्तित्व होता है जिस कारण से ये नहीं कहा जा सकता की आपने अपने लेखे से व्यापार किया था। इसलिए आपको कंपनी को ये बात बताने की आयश्यकता नही थी की आप स्वयं अपने कंपनी के साथ व्यापार कर रहे थे।

आप अपने मलिक के नॉर्देशो का पालन करते हुए कंपनी के साथ संविदा किया . इस संविदा में अंतिम निर्णय लेने का अधिकार आपके पास नही था . उसे विभ्हिन्न चरणो पर अनुसमर्थन किया गया I पन्ना लाल बनाम मोहनलाल AIR 1961 SC में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णीत किया था की यदि किसी अभिकर्ता के स्वयं के लेखे से मलिक को नुकसान होता है तो मलिक को अधिकार है की वो उस नुकसान को अभिकर्ता से वापस वसूल ले . यदि अभिकर्ता ने मलिक के निर्देशो का पालन करते हुए अपने अभिकरण के कारबार के तहत कार्य किया है तो फिर मलिक किसी नुकसान को प्राप्त करने का अधिकार नही रखता है.

संविदा के अनुसार आपको कोई निर्देश नही दिया गया था की आप किसी परिचित को कारया नही देंगे जिसके लाभ में आपका हित हो . कंपनी चाहे आपके पत्नी के नाम था लेकिन उसका अपना अलग विधिक व्यक्तित्वा होता है इसलिए ये नही कहा जा सकता की उसके लाभ में आपका हित था क्यो की उसला लाभ कंपनी के निदेशक और अंश धारक को होता है . ना तो आप कंपनी में अंश धारक हैं और ना ही निदेश तो आपको कंपनी के फयडे में हिस्सा लेने का अधिकार नही है.

यदि अभिकर्ता को कोई लाभ हुआ है तो उसे मलिक को वापस करना होगा ये सिद्धांत सर्व्यापी नही है . इसके भी कुछ सिद्धांत हैं, मलिक को साबित करना होगा की अभिकर्ता के स्वयं के लेखे से व्यापार करने से मलिक को नुकसान उठना पड़ा . ये नुकसान अभिकर्ता के किसी सरवन तथ्य को जानबूझ कर छिपाने के कारण हुआ.

आपके मामले मैं आपके द्वारा ठेके देने से कंपनी को कोई नुकसान नही हुआ . कंपनी ये सवित नही कर सकता की आपने उस ठको से अवैध रूप से कोई फायदा उठाया है . धारा २३८ के अनुसार कंपनी को अधिकार है की वो अभिकर्ता से कपट (fraud) या दुर्व्यापदेसन (misrepresentation) से प्रभावित संविदा को समाप्त कर दे.

कपट अपराधिक और सिविल दोनो प्रकार का होता है . संविदा विधि के धारा १७ में कपाट को परिभासित किया गया है जिसके अनुसार संविदा का एक पक्षकार प्रवंचना करने के आशय से संविदा करता है और असत्य बात को सत्य के रूप में बताता है तो वह कपट माना जायेगा . ये सिविल प्रकृति का कपट है और संविदा विधि के अनुसार मालिक नुकसान पाने का हक़दार होता है वो अपराधिक मामला दायर नहीं कर सकता.

आपके मामले के अनुसार आपने कभी भी अपने पत्नी की कंपनी को ग़लत तरीके से पचारित नही किया ताकि अपने मलिक से संविदा किया जा सके . यदि आपका मलिक ये सविट करता है की अपने पत्नी की कंपनी से संविदा करने के लिए आपने कंपनी के तात्विक तथ्यों के बारे में झूठ बोला या छुपाया तब कहा जा सकता है की आपने संविदा विधि के तहत कपट किया इसलिए संविदा को भंग कर देना चाहिए.

अपराधिक विधि में कपट को धारा ४१५ में परिभाषित किया गया है जिसके अनुसार यदि कोई व्यक्ति जानबूझ कर किसी व्यक्ति को प्ररित करता है की वो कोई संपत्ति किसी व्यक्ति को देदे या कोई कारया करे जो उत्परेरित नही किया गया होता तो नही करता और इस्परकार संपाति देने या कारया करने से उसे शारीरिक, मानसिक, प्रतिष्ठा या संपत्ति का हानि होता है . धारा ४२० के तहत अपराध के लिए आवश्यक है की उत्परेरणा और क्षति में परस्पर संबंध हो, और यदि उत्प्रेरित नहीं किया गया होता तो क्षति भी नहीं हुआ होता.

आपके मामले में आपने ना तो उत्परेरित किया और नही आपके कार्य से कंपनी को कोई हानि हुआ तो इस्प्रकार धारा ४२० में कोई अपराध नही बनता है .Rajesh Bajaj vs State of NCT Delhi AIR (1999) SC 1216 सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णीत किया है की यदि ये साबित नही होता की –

  1. अभियुक्त के प्रवंचनापूर्ण कार्य से कार्य करने के लिए उत्प्रेरित किया था 
  2. अभियुक्त ने ये कार्य अपने को सदोष लाभ और किसी को सदोष हानि कारित करने के लिए किया था
  3. और मामला सिविल प्रकृति का है तो धारा ४२० के तहत अभियोजन को समाप्त (quash) कर दिया जाएगा . अतः उपरोक्त चर्चा से ये निष्कर्ष निकलता है की आपके खिलाफ ना तो सिविल और ना ही दणडिक मामला बनता है . क्योकी –

१. आपने कभी भी मलिक को उत्परेरित नही किया

२. आपने कोई सदोष लाभ अर्जित नही किया

३. मलिक को कोई नुकसान करित नही हुआ

४. कंपनी के बारे में कभी दुर्व्यापदेशन नही किया

५. निर्णय लेने का अंतिम अधिकार आपके पास नही था

६. आपके पत्नी की कंपनी को आपके कारण कोई विशेष लाभ नही हुआ

७. ठेके लेने में सामानया प्रक्रिया अपनाया गया

८. कोई विशेष लाभ या कोई आंतरिक सूचना आपके पत्नी की कंपनी को नही दिया गया

९. मलिक को ना तो मानसिक, शारीरिक, प्रतिष्ठा या संपत्ति का कोई नुकसान करित हुआ

यदि आपके खिलाफ धारा ४२० में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराया जाता है तो आप तुरंत धारा ४८२ दंड प्रक्रिया संहिता के तहत उच्च न्यायालय में एक याचिका दाखिल करें और प्रथम सूचना रिपोर्ट को समाप्त करने का प्रार्थना करे क्योकि उक्त अपराध करित करने का प्रथम दृष्टया साक्ष्या सूचना रिपोर्ट पर उपलब्ध नही है।

Tags: Civil Law

Shivendra Pratap Singh

Shivendra Pratap Singh

Advocate

Advocate Shivendra, practicing law since 2005, specializes in criminal and matrimonial cases, extensive litigatin experience before the High Court, Sessions court & Family Court. He established kanoonirai.com in 2014 to provide dependable and pragmatic legal support. Over the years, he has successfully assisted thousands of clients, making the platform a trusted resource for criminal and matrimonial dispute resolution in India.

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